भारतीय मानस को चाहिए नई पाठशाला
प्रतीकात्मक फोटो भारतीय मानस को एक नई पाठशाला की जरूरत है। आप सोच रहे होंगे, नई पाठशाला भला ये क्या बला है। लेकिन जनाब यह जरूरी है। नई पाठशाला ऐसी जिसमें नए विचारों के साथ सोचने और समझने की जरूरत है। गहन अध्ययन करने की जरूरत है। क्या आपके मन में सवाल उठता है कि 'हम' यानी 'भारत' आजादी के इतने सालों बाद भी आधुनिकता में विकसित देशों से पीछे क्यों हैं? क्या हम वाकई पीछे हैं या कहीं ऐसा तो नहीं कि हमें पीछे रखा जा रहा है। पहला कारण; अभी हाल के घटनाक्रम को देखें तो यह बात आपको भी सही जान पड़ेगी; अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा व्हाइट हाउस से कहते हैं कि, उन्हें डर लगता है भारत से, उसकी तरक्की से; कहीं वह तरक्की में आगे न निकल जाए। भारतीय मानस की प्रकृति निरा सपाट रही है। हमें अपनी लकीर बढ़ाने में यकीन भी है, रुचि भी है और भरोसा भी। पर दूसरे की लकीर को छोटा करना हमारी प्रकृति, संस्कार और व्यवहार का हिस्सा नहीं है। अमेरिका जैसा विकसित देश अपना पैसा दूसरे देश जाने देने से रोकना चाहता है, इसलिए दुनिया के कई देशों समेत भारत में अमेरिकी कंपनियों के कॉल सेंटरों पर खतरा मंडराने ल...