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आपबीती : कोरोना महामारी से जूझते हुए हम

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कोरोना वायरस जब से अपने नए-नए स्वरूपों के साथ पूरी दुनिया में फैला है, इसने लाखों लोगों की जान ले ली है। बस इतना ही नहीं, यह आज भी लाखों लोगों की परेशानी का सबब बना हुआ है। कारण कि इसकी वजह से कई लोगों ने जान गंवाई है तो वहीं कई लोग परेशानियां झेल रहे हैं।  ऐसे लोगों की फहरिस्त में अब मेरा नाम भी जुड़ गया है। हालांकि अभी तक तो सबकुछ ठीक ही है। जैसा कि मेरे डॉक्टर ने कहा- जान का जोखिम नहीं है। परंतु डॉक्टर की इस बात को सुनकर सतर्कता और सावधानी को कम नहीं किया जा सकता। हाल यह है कि रह-रहकर खांसी आ रही है। कभी तेज हो जाती है तो कभी धीमी।  खांसी के तेज होने पर डर सताने लगता है कि कहीं शरीर के अंदर कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं चल रही है। ऐसी गड़बड़ जिसके बारे में मैं खुद और डॉक्टर भी अनजान हैं। क्योंकि हमारी चिकित्सा व्यवस्था अभी इतनी आधुनिक नहीं हुई है कि शरीर के अंदर की हर बारीक से बारीक गड़बड़ी को पकड़ सके।  जैसी कि विज्ञान फंतासी से ओतप्रोत फिल्मों में हमें दिखाया जाता है। बहरहाल, मुझे लगता है कि यह सारी बातें लिखकर कम से कम मैं अपने जहन और मन को तो शांत कर पाऊंगा। अपने अंदर की...

पिंकू की प्रेरणा 3

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प्रतीकात्मक फोटो पिंकू को यहां-वहां खुरपी मारते हुए थोड़ा समय बीत जाने के बाद आखिरकार रामसुख ने अपना सवाल दाग ही दिया। उसने पूछा- आप बड़े होकर क्या बनना चाहते हो? पिंकू ने तपाक से कहा- बड़ा होकर मैं माली बनूंगा। ये सुनते ही रामसुख एक पल को अवाक रह गया। उसने पिंकू से कहा- नहीं भइया, माली मत बनना। रामसुख की इस बात के पीछे एक अलग ही मर्म छिपा हुआ था। क्योंकि जवाब देने से ठीक पहले उसके जहन में वो सभी कारण उठ खड़े हुए थे, जो चाहते थे कि वो पिंकू से साफ कहे कि जीवन में कुछ भी बनना पर माली मत बनना। रामसुख को लोग फूल उगाते, पौधों को खाद-पानी देते और मिट्टी को संवारते हुए देखते हैं। लेकिन वे यह नहीं जानते कि इसमें कितनी मेहनत लगती है। कितना कष्ट सहना पड़ता है। खैर, इसके बावजूद फूल, पेड़-पौधों की सेवा करके मन तो भर जाता है पर पेट का क्या करें। इसे कहां ले जाएं। फिर घर में बच्चे भी तो हैं, मां-बहन और पत्नी भी तो है। इतनी कड़ी मेहनत के बाद भी उनके लिए दो निवाले जुटाना भी कितना दुश्वार है, यह सिर्फ रामसुख ही जानता है। क्योंकि कई रातें उसने पानी पीकर ही गुजारी हैं। रामसुख के जोर देकर नहीं ...